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चंद्रशिला से गुफ्तगू



चले थे मिलने अनजान लोगों से,

सोचा था कुछ वक्त के लिऐ खुद को भुला देंगे,

सोचा था एक नयी दुनिया बसा लेंगे,

सोचा था नयी सोच से मिलेंगे।

 

अनजाने से उन लोगों से मुलाकात हुई,

सब इक्टठे हुए और मजे की वो बात हुई

निकल पड़े अपनी मंज़िल की ओर,

और उस सफर मे एक दूसरे से बात हुई।

 

चलते चलते पहुँचे हम अपनी मंजिल की पहली पौड़ी पर।

वो शाम का समा और वो ओलों की बरसात,

वो चाय की चुस्की और वो ठण्डी फुहार।

 

अगले दिन निकले हम एक खूबसूरत से सफर की ओर,

पंछियों से मिलने, उनसे बातें करने,

पहाड़ों से मिलने, उनसे हौसला सीखने,

पेड़ों से मिलने, उनसे मुस्कराहट सीखने।

 

वो चांदी की चादर से ढके हुए पहाड़,

वो सुंदर फूलों से ढका हुआ ताल,

वो बारिश की बूंदे,

वो गानो की महफिल,

वो दोस्ती की महक,

वो चिड़िया की आवाज,

वो सूरज का डूबना,

वो सवेरे का इंतजार।

 

फिर से निकल गए एक नयी मंजिल की ओर,

बीते लम्हों को याद करके और नयी यादें बनाने।

 

नर्यी मंजिल को नयी थी पहचान,

चारों ओर से घिरा आसमान।

वो शाम हुई और बादल ने किया गूंज नाद

जैसे बोला स्वागत है मेरे मेहमान,

जैसे बोला इस धरती को सम्भाल कर रखना,

इस धरती के हर फूल को खिलाए रखना,

अपनी मुस्कराहट बिछाए रखना।

 

हर सुबह एक नया जोश लाती थी,

रोजमर्रा की ज़िन्दगी से दूर ले जाती थी।

नया खून सा बेहता था रगों में,

हमें अलग अलग अनुभव वो कराती थी।

 

टेढ़ी सी डगर पर निकल गये,

एक दूसरे का हाथ थामे चलते चले गये,

झरने की आवाज ने सबका मन मोह लिया,

गाते गुनगुनाते ये कारवां आगे हो लिया।

 

जंगल से रूबरू हुए.

फूलों से आँखे चार हुई,

दोस्तों ने खूब इंसाया,

और मधुमक्खियों ने शोर मचाया।

 

लौट कर आए अपने ठिकाने, मौसम का लुफ्त उठाये,

गढ़रियों ने राग गाया, भेड़ों ने भी सिर हिलाये,

मौजों को रवानी हुई, और फिर ये मंजिल एक और दिन पुरानी हुई।

 

सोचते रहे ये लम्हे यहीं थम जाये,

काश ये सफर ऑर भी लम्बा हो जाये।

तारों की छाँव में गानों का सिलसिला फिर शुरू हुआ,

बड़ों का बचपन फिर जवां हुआ।

 

चले अब हम अपनी आखिरी मंजिल की ओर,

चंद्रशिला की चोटी पर मचाने शोर।

शिव के धाम के दर्शन थे चोखे।,

चल दिये हम भोले के भगतों के संग होके

 

जा पहुँचे शिखर पर,

दंग रह गये सब देख कर

चारों ओर से पहाडों ने घेरा,

बादलों ने लुक्का छुप्पी का खेल खेला।

 

उनकी परछांईयों ने पहाड़ों में अलग अलग रंग भर दिये,

जिंदगी बहुत रंगीन है वो हमें ये सिखा कर चल दिये।

 

अब आयी आखिरी दिन की सुबह जिसका किसीको ना इंतज़ार था,

पर वक्त कहाँ ठहरता है ये सबको विशवास था।

करके अलविदा सबको हम यादें समेट चले,

मिलेंगे कभी ये वादे कर चले॥

 

By:-

Priyanka Gupta

 

Comments

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12 Replies to “चंद्रशिला से गुफ्तगू”

  1. Ankita says:

    Awsmmmm… so pure

  2. Jyothi Indira says:

    Awesome 🙂

  3. Nimit Kothari says:

    Woww priyanka.. Way to go!!!

  4. Anurita says:

    Lovely.. Driving close to nature

  5. Nagendra says:

    Supeb….very nice lines…

  6. siddharth rao says:

    superlike.

  7. Vipin agarwal says:

    Superb

  8. Vijay sharma says:

    Very nice

  9. Dipesh says:

    Such a heart touching lines👏👏👏

  10. Deepak Kumar Agarwal says:

    Wah, Superb….

  11. Vikas Goyal says:

    Very nice heart touching

  12. Ashok Gupta says:

    Superb

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